
असम की सियासत इस वक्त सिर्फ गर्म नहीं… उबल रही है। वोटिंग से ठीक पहले एक ऐसा सियासी ट्विस्ट आया है, जिसने पूरे चुनावी खेल का गणित बदल दिया है। जहां एक तरफ BJP जीत की हैट्रिक का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस ने पर्दे के पीछे ऐसा दांव खेला है, जो सीधा दिल और दिमाग दोनों पर वार करता है। सबसे बड़ा झटका—वही साथी अब बाहर, जिसके बिना अल्पसंख्यक राजनीति अधूरी मानी जाती थी।
“अजमल OUT: कांग्रेस ने खुद ही काटा अपना पुराना पत्ता”
इस बार कांग्रेस ने सबसे बड़ा और सबसे चौंकाने वाला फैसला लिया—Badruddin Ajmal और उनकी पार्टी AIUDF से पूरी दूरी। यह वही अजमल हैं जिनके साथ 2021 में कांग्रेस ने हाथ मिलाया था ताकि मुस्लिम वोट बैंक consolidate हो सके। लेकिन नतीजा उल्टा पड़ा। मुस्लिम इलाकों में तो फायदा हुआ, लेकिन पूरे राज्य में एक बड़ा polarization खड़ा हो गया। हिंदू वोट एकजुट होकर BJP के पक्ष में चला गया और कांग्रेस का संतुलन बिगड़ गया। इस बार कांग्रेस ने वही गलती दोहराने से इनकार कर दिया है।
“पोलराइजेशन का डर: कांग्रेस ने क्यों बदला गेम?”
राजनीतिक विश्लेषक रूबी अरुण के मुताबिक, पिछली बार अजमल के साथ गठबंधन ने BJP को एक मजबूत नैरेटिव दे दिया था—“एक तरफ हम, दूसरी तरफ वो।” यह binary politics BJP के लिए फायदेमंद साबित हुई। कांग्रेस ने इस बार उसी trap से बाहर निकलने का फैसला किया। अजमल से दूरी बनाकर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह सिर्फ एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे असम की राजनीति कर रही है।
“ऊपरी असम: जहां जीत-हार तय होती है”
असम का असली राजनीतिक रणक्षेत्र ऊपरी असम है—जहां identity, culture और regional pride सबसे ज्यादा असर डालते हैं। 2021 में कांग्रेस को यहां भारी नुकसान हुआ था क्योंकि अजमल की मौजूदगी ने स्थानीय वोटर्स को असहज कर दिया था। BJP ने इसी sentiment को cash किया और बड़ी जीत हासिल की। इस बार कांग्रेस उसी गलती को सुधारने की कोशिश में है। अजमल से दूरी बनाकर पार्टी upper Assam में lost ground वापस पाना चाहती है।
“परिसीमन का नया गणित: बदलेगा पूरा खेल?”
2023 के परिसीमन ने चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या घट गई है, जिससे traditional vote-bank politics कमजोर हुई है। अब चुनाव जीतने के लिए broader coalition और diversified support जरूरी हो गया है। कांग्रेस ने इसी बदलाव को समझते हुए अपनी strategy reset की है। अब focus सिर्फ एक वोट बैंक नहीं, बल्कि multi-layered alliance पर है।
“नया गठबंधन: कांग्रेस का ‘चक्रव्यूह’ तैयार”
अजमल से दूरी बनाने के बाद कांग्रेस खाली नहीं बैठी। उसने रायजोर दल, असम जातीय परिषद और वामपंथी दलों के साथ मिलकर एक नया गठबंधन खड़ा किया है। यह गठबंधन ideology से ज्यादा arithmetic पर आधारित है—कहां कितने वोट, किस सीट पर किसकी पकड़, और किसे candidate बनाना है। यह एक calculated political engineering है, जो BJP के dominance को challenge करने के लिए तैयार की गई है।

“BJP का काउंटर अटैक: खेल अभी खत्म नहीं”
लेकिन यह कहानी एकतरफा नहीं है। BJP भी अपने तरीके से counter strategy चला रही है। सत्ताधारी गठबंधन में शामिल असम गण परिषद ने बंगाली मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर एक नया twist ला दिया है। यह move सीधे कांग्रेस और अजमल दोनों के equation को disturb करता है। BJP अब सिर्फ polarization नहीं, बल्कि targeted outreach की strategy भी अपना रही है।
“कांग्रेस का रिस्क: फायदा या उल्टा वार?”
अजमल से दूरी बनाना कांग्रेस के लिए double-edged sword है। एक तरफ इससे polarization कम हो सकता है और broader appeal बन सकती है। लेकिन दूसरी तरफ risk यह है कि मुस्लिम वोट split हो जाए। अगर ऐसा हुआ, तो BJP को सीधा फायदा मिल सकता है। यानी कांग्रेस का यह दांव या तो masterstroke साबित होगा, या फिर biggest blunder।
“नैरेटिव की जंग: विकास vs पहचान”
इस चुनाव में दो बड़े नैरेटिव आमने-सामने हैं। BJP development, governance और stability की बात कर रही है, जबकि कांग्रेस inclusive politics और alliance strategy पर खेल रही है। लेकिन ground पर असली लड़ाई identity की है—कौन किसको represent करता है और कौन किसके साथ खड़ा है।
असम में इस बार मुकाबला सीधा नहीं, layered है
असम का चुनाव इस बार simple BJP vs Congress नहीं है। यह strategy vs strategy, narrative vs narrative और risk vs reward की लड़ाई है। कांग्रेस ने अजमल को बाहर करके एक बड़ा gamble खेला है। अब देखना यह है कि यह gamble उसे सत्ता के करीब ले जाता है या फिर BJP को तीसरी बार जीत की सीढ़ी चढ़ा देता है। फिलहाल इतना तय है—इस बार असम का चुनाव predictable नहीं, explosive होने वाला है।
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